एककवितारोज़विषयक

रात गए एक ख़्वाब देखा :

एक कविता कार्यशाला में आमंत्रित हूँ, लेकिन वहाँ कोई कवि नज़र नहीं आ रहा है।

कुछ पल बाद यह समस्या समझ पाता हूँ कि यहाँ कवि को कवि नहीं नज़र आएँगे।

सब तरफ़ कवि ही कवि नज़र आएँ, इसके लिए अकवि होना होगा।

मैं अकवि नहीं हो पाता, क्योंकि मैं यहाँ कविता संभव करने के लिए हूँ।

यह काम मैं कुछ देर में कर देता हूँ।

इसके बाद एक भद्र-सा व्यक्ति आता है और मेरे हाथ से कविता ले लेता है।

सब तरफ़ काले कपड़ों में लड़के-लड़कियाँ हैं जिन्होंने मस्तक पर लाल पट्टी बाँध रखी है। उनके हाथों में लोहे के रॉड हैं।

इस समूह में से एक लड़की आगे आती है और उस भद्र व्यक्ति के हाथ से मेरी कविता ले लेती है। वह इसे पढ़ती है और उसमें आए कई शब्दों को लाल स्याही से घेर देती है। वह हिक़ारत से मेरी तरफ़ देखते हुए कहती है : ये शब्द नहीं चलेंगे। इनकी जगह वे शब्द रखिए जो हमारे शब्दकोश में हैं।

मैं उससे पूछता हूँ कि आपका शब्दकोश कहाँ है? इस पर वह लड़की एक लड़के की तरफ़ इशारा करती है। वह लड़का मुझसे चलने का इशारा करता है और मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ता हूँ।

उनका शब्दकोश एक दीवार पर लिखा हुआ है। उसे एक जगह ठहरकर पूरा नहीं देखा जा सकता। उसे देखने के लिए सीधे चलते रहना होगा। इस दीवार पर प्रत्येक शब्द बहुत विशाल और महत्वाकांक्षी ढंग से लिखा हुआ है। उसने व्यापक स्थान घेर रखा है और उसे लिखने के लिए केवल लाल और काले रंग को ही प्रयोग में लाया गया है। किसी भी शब्द का यहाँ कोई लिंग नहीं है। उसकी कोई जाति भी नहीं है। उनके साथ व्याकरणिक संक्षेप-चिह्न, भाषा स्रोत के संक्षेप-चिह्न और विषयों के संक्षेप-चिह्न आदि नहीं हैं। वे केवल शब्द हैं और बमुश्किल बीस मीटर चलने पर ख़त्म हो जाते हैं।

वह लड़का मुझसे कहता है कि अब आप यह दूरी दौड़कर तय कीजिए और वे शब्द जो हाँफते हुए पकड़ में आ जाएँ, उन्हें ही इधर-उधर करके कविता लिखिए।

मैं उससे और उसके लोहे के रॉड से झगड़ने लगता हूँ कि इतने में मेरी नींद टूट जाती है।

~•~

इस प्रकार जागकर मुझे लगता है कि मैं भी अब अपने वरिष्ठों, कनिष्ठों और हमवयस्कों की तरह रोज़ एक या एकाधिक कविता लिखने में प्रवीण हो चुका हूँ।

इधर क़रीब पाँच-छह बरस से मैं जिन्हें देखकर रोज़ हैरत में पड़ता रहा हूँ, आज हैरान हूँ कि मैं भी उनके जैसा ही हो गया हूँ।

मैं वह अनुशासन पा गया हूँ जिसके ज़रिए रोज़ एक या एकाधिक कविता संभव की जा सकती है। यह बिल्कुल रोज़ सुबह की पहली चाय बनाने जैसा है। चाय आप कैसी पीते हैं या आप पर निर्भर है और उसका रोज़ बेहतर बनना या न बनना भी। लेकिन चाय बनेगी ज़रूर, क्योंकि उसके बग़ैर किसी काम में मन नहीं लगेगा। चाय जिसके ठंडे हो जाने का दुख कहीं बम फट जाने के दुख से बड़ा है; यों एक कवि कह चुका है।